आधुनिक विश्व-समाज में गीतोक्त ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चय’’ सिद्धान्त की प्रासंगिकता (काश्मीर शैवदर्शन के आलोक में)

Authors(1) :-डाॅ0 सी0 के0 झा

भारतीयदर्शन की दार्शनिक विचारधारा सुदूर वैदिककाल से श्रुतिमूलक तथा आगममूलक इन दो प्रधान स्रोतों में प्राप्त होती है। इन दोनों स्रोतों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि निगमाश्रित सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा आदि दार्शनिक प्रस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर जहाँ विद्वानों ने यथार्थ प्रकाश डाला है, वहीं आगमाश्रित शैव, शाक्त तथा वैष्णव धाराओं का विपुल साहित्य उपलब्ध होने पर भी उस दिशा में विशेष कार्य नहीं हुआ है। प्रस्तुत आलेख प्रत्यभिज्ञा-दर्शन से सम्बद्ध है, जो परमशिव की भावना को प्रकाशित करने वाला गंभीर एवं सूक्ष्म चिंतन प्रसूत दर्शन है। काश्मीर शैव-परम्परा, में यह ग्रन्थ मात्र ऐतिहासिक और धार्मिक ही नहीं है। वह चाहे रामकण्ठ की ‘‘सर्वतोभद्र’’ टीका हो या अभिनवगुप्त कृत ‘‘श्रीमद्भगवद्गीतार्थसंग्रह’’ टीका या फिर राजानक आनन्द प्रणीत आनन्दवर्धिनी टीका तीनों ने ही कुरूक्षेत्र युद्ध को सतत प्राणी मात्र में होने वाले दैवासुर (धर्म, अधर्म) संग्राम के प्रतीक के रूप में माना है। साथ ही तीनों का मुख्य प्रतिपाद्य ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चय’’ या ज्ञान कर्म का सहभाव ही है। क्रिया रहित ज्ञान पंगु है और बिना ज्ञान के कर्म अन्धा है। ज्ञान और क्रिया वस्तुतः एक पारमेश्वरी शक्ति का उत्तरोत्तर विकास है। परमशिव का स्वातन्त्र्य शक्ति ही चित्, आनन्द, ज्ञान, इच्छा एवं क्रिया संवलित है। अतः चिदानन्दज्ञानेच्छाक्रिया स्वातन्त्र्य शक्ति का स्वभाव होने से ज्ञान और क्रिया स्वरूप में अलग-अलग नहीं रह सकते। राजानक आनन्द ने ‘‘आनन्दवर्धिनी’’ में स्पष्ट रूप से कहा है कि ज्ञान और कर्म के समुच्चय से ही परमपुरुषार्थ की प्राप्ति सम्भव है। ज्ञान में जीवन की सत्यता तभी आती है जब उसे कर्म के खोखले में ढाला जाता है, और कर्म में नैतिकता तभी पनपती है जब उसे ज्ञान से परिमार्जित किया जाता है। कर्म से ही ज्ञान का विकास होता है और ज्ञान से कर्म में औचित्य का संचार होता है। अतः गीता ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चयात्मक’’ ग्रन्थ है।

Authors and Affiliations

डाॅ0 सी0 के0 झा
एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, एम0पी0एन0 काॅलेज, मुलाना, अम्बाला (हरियाणा)

  1. विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः। ई0प्र0वि0, भाग0 1.1.8.11.
  2. न क्रिया रहितं ज्ञानं न ज्ञान रहिता क्रिया। नेत्रतन्त्र उद्योत टीका, भा0-1, पृ0 42
  3. परामर्शो ही चिकीर्षारूपेच्छा, तस्यां च सर्वमन्तर्भूतं निर्मातव्यमभेदकल्पनास्ते। ई0प्र0वि0भा0 2, पृ0181
  4. ज्ञानकर्मसमायोगात् परं प्राप्नोति पुरुषः। आ0, पृ0 8
  5. तस्माद् गीतासु केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः, न कर्मसमुच्चितात्। भगवद्गीता की शंकराचार्य की टीका, 2,11.
  6. अविद्याकामवत् एव सर्वाणि श्रौतादीनि दर्शितानि। वहीं पर।
  7. गीताशास्त्रस्य प्रयोजनं परं निःश्रेयसम्, सहेतुकस्य संसारस्य अत्यन्तोपरामलक्षणम्। गीता पर शंकराचार्य की टीका की भूमिका।
  8. बृ0उ0 (शां0भा0) 4.5.15, पृ0 1154
  9. न हि ब्रह्मात्मैकत्त्वदर्शनेन सहकर्म स्वप्नेऽपि सम्पादयितुं शक्यम्- मु0उ0 (शां0भा0) प्रथम खण्ड, पृ0 9
  10. ज्ञानं प्रधानं न तु कर्महीनं कर्म प्रधानं न तु बुद्धिहीनम्। तस्मादुभाभ्यां तु भवेऽत्र सिद्धिर्नह्येकपक्षो गरुडः प्रयाति।। याज्ञवल्क्य स्मृति57 के अपरार्ककृत टीका में उद्धृत तथा आ0 पृ0 8
  11. गीता0 3.1
  12. निष्ठा निर्वहणं ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानेनश्रेयः प्राप्तिरितीत्थं सिद्धान्तस्योक्तिः आ0, 3.3
  13. द्वयसाध्या एक पुरुषविषया प्रोक्ता। वहीं पर।
  14. समुच्चयवादिनस्तु कर्मणामत्यागेन, अनुष्ठानेनेति द्वयोरपि फलश्रुतिरस्ति।- सर्वतोभद्र, पृ0 117.
  15. न क्रिया रहितं ज्ञानं न ज्ञानरहिता क्रिया। ज्ञानक्रिया विनिष्पन्न आचार्यः पशुपाशहा।। गी0सं0 3-3.4
  16. तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरावुभौ। तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।। मनु0, 12.104, आ0पृ0 7 पर उद्धृत।
  17. न्यायागतधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोऽतिथि प्रियः। श्रद्धकृत् सत्यवादी च गृहस्थोऽपि विमुच्यते।। या0, 3.205 तथा आ0पृ0-8 पर उद्धृत।
  18. एवं ज्ञानवतः कर्म कुर्वतोऽपि प्रजादिकम्। भवेन्मुक्तिद्र्विजश्रेष्ठ रैभ्यस्य वचनं यथा।। आ0, पृ0 9 पर उद्धृत।
  19. यथाश्वा रथहीनास्तु रथा वाश्वैर्विना यथा। एवं तपोऽप्यविद्यस्य विद्या वाप्यतपस्विनः। वहीं पर।
  20. मोहमेव हि गच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः।। वहीं पर।
  21. ई0, 2.
  22. बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। आ0 7-19
  23. तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।ं गी0 2.50
  24. सांख्ययोगौ पृथग्वालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। गी0 5.4
  25. भारतीय दर्शन, डाॅ0 राधाकृष्णन्, पृ0 510

Publication Details

Published in : Volume 1 | Issue 2 | July-August 2018
Date of Publication : 2018-08-30
License:  This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
Page(s) : 214-219
Manuscript Number : SHISRRJ221225
Publisher : Shauryam Research Institute

ISSN : 2581-6306

Cite This Article :

डाॅ0 सी0 के0 झा, "आधुनिक विश्व-समाज में गीतोक्त ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चय’’ सिद्धान्त की प्रासंगिकता (काश्मीर शैवदर्शन के आलोक में) ", Shodhshauryam, International Scientific Refereed Research Journal (SHISRRJ), ISSN : 2581-6306, Volume 1, Issue 2, pp.214-219, July-August.2018
URL : https://shisrrj.com/SHISRRJ221225

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