Manuscript Number : SHISRRJ221225
आधुनिक विश्व-समाज में गीतोक्त ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चय’’ सिद्धान्त की प्रासंगिकता (काश्मीर शैवदर्शन के आलोक में)
Authors(1) :-डाॅ0 सी0 के0 झा भारतीयदर्शन की दार्शनिक विचारधारा सुदूर वैदिककाल से श्रुतिमूलक तथा आगममूलक इन दो प्रधान स्रोतों में प्राप्त होती है। इन दोनों स्रोतों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि निगमाश्रित सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा आदि दार्शनिक प्रस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर जहाँ विद्वानों ने यथार्थ प्रकाश डाला है, वहीं आगमाश्रित शैव, शाक्त तथा वैष्णव धाराओं का विपुल साहित्य उपलब्ध होने पर भी उस दिशा में विशेष कार्य नहीं हुआ है। प्रस्तुत आलेख प्रत्यभिज्ञा-दर्शन से सम्बद्ध है, जो परमशिव की भावना को प्रकाशित करने वाला गंभीर एवं सूक्ष्म चिंतन प्रसूत दर्शन है। काश्मीर शैव-परम्परा, में यह ग्रन्थ मात्र ऐतिहासिक और धार्मिक ही नहीं है। वह चाहे रामकण्ठ की ‘‘सर्वतोभद्र’’ टीका हो या अभिनवगुप्त कृत ‘‘श्रीमद्भगवद्गीतार्थसंग्रह’’ टीका या फिर राजानक आनन्द प्रणीत आनन्दवर्धिनी टीका तीनों ने ही कुरूक्षेत्र युद्ध को सतत प्राणी मात्र में होने वाले दैवासुर (धर्म, अधर्म) संग्राम के प्रतीक के रूप में माना है। साथ ही तीनों का मुख्य प्रतिपाद्य ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चय’’ या ज्ञान कर्म का सहभाव ही है। क्रिया रहित ज्ञान पंगु है और बिना ज्ञान के कर्म अन्धा है। ज्ञान और क्रिया वस्तुतः एक पारमेश्वरी शक्ति का उत्तरोत्तर विकास है। परमशिव का स्वातन्त्र्य शक्ति ही चित्, आनन्द, ज्ञान, इच्छा एवं क्रिया संवलित है। अतः चिदानन्दज्ञानेच्छाक्रिया स्वातन्त्र्य शक्ति का स्वभाव होने से ज्ञान और क्रिया स्वरूप में अलग-अलग नहीं रह सकते। राजानक आनन्द ने ‘‘आनन्दवर्धिनी’’ में स्पष्ट रूप से कहा है कि ज्ञान और कर्म के समुच्चय से ही परमपुरुषार्थ की प्राप्ति सम्भव है। ज्ञान में जीवन की सत्यता तभी आती है जब उसे कर्म के खोखले में ढाला जाता है, और कर्म में नैतिकता तभी पनपती है जब उसे ज्ञान से परिमार्जित किया जाता है। कर्म से ही ज्ञान का विकास होता है और ज्ञान से कर्म में औचित्य का संचार होता है। अतः गीता ‘‘ज्ञानकर्मसमुच्चयात्मक’’ ग्रन्थ है।
डाॅ0 सी0 के0 झा Publication Details Published in : Volume 1 | Issue 2 | July-August 2018 Article Preview
एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, एम0पी0एन0 काॅलेज, मुलाना, अम्बाला (हरियाणा)
Date of Publication : 2018-08-30
License: This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
Page(s) : 214-219
Manuscript Number : SHISRRJ221225
Publisher : Shauryam Research Institute
URL : https://shisrrj.com/SHISRRJ221225