भारत में शारीरिक शिक्षा का उद्भव एवं विकास
Abstract
सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्।
लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ (चरक)
अर्थात् मन आत्मा और शरीर ये तीनों (घड़ा रखने की) तिपाई के समान हैं। जीवसृष्टि इनके संयोग से खड़ी है और उसमें (कर्मफलादि, सुखदुःखादि) सर्व अधिष्ठित है। जिस प्रकार तिपाई के तीन पायों में से एक पाया न होने पर तिपाई खड़ी नहीं हो सकती, उसी प्रकार आत्मा, मन और पंचभौतिक शरीर इनमें से एक के न होने से जीव-सृष्टि उत्पन्न नहीं हो सकती। आत्मा एवं मन की स्वस्थता हेतु शरीर का स्वस्थ रहना नितान्त आवश्यक है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक शिक्षा भी जरूरी है। इस प्रकार प्राचीन काल से वर्तमान तक शारीरिक शिक्षा की विकास यात्रा की एक झलक इस पत्र के माध्यम से प्रस्तुत की जा रही है।
Keywords:
भारत, शारीरिक, शिक्षा, प्राचीन, वर्तमान, विकास, यात्रा।References
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