राजेश जोशी की कविता में समाज-समीक्षा और संघर्ष-चेतना: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Abstract
राजेश जोशी के कविता लोक में गृहस्थी, प्रेम, रोजमर्रा के जीवन और सम्बन्धों पर लिखी गयी तमाम कविताएँ भी हैं, जो अपने कलेवर और बयान में बेहद कोमल हैं। उनकी भाषा अपने विशिष्ट तेवर के बावजूद अत्यंत साधारण शब्दांे से बुनी हुई है, वह सड़क पर चल रहे आम आदमी की भाषा है। भारतीय शास्त्र एवं परम्परा से परिचित और बहुपठ होने के बावजूद राजेश जोशी अपनी भाषा में बेवजह की तत्समता से न केवल बचते हैं बल्कि उनकी भाषा का मिजाज़ ख़ालिस ‘हिन्दुस्तानी’ का है। यही वजह है कि वे बेहद आमफहम भाषा में अपनी बात को पाठक तक सम्प्रेषित कर पाने में सम्भव हुए हैं।
Keywords:
राजेश जोशी, कविता, समाज-समीक्षा, संघर्ष-चेतना, सौन्दर्य, सम्बन्ध, भारतीय, शास्त्र।References
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- राजेश जोशी: दो पंक्तियांे के बीच, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000
- राजेश जोशी: चाँद की वर्तनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006
- बलदेव वंशी: आधुनिक हिन्दी कविता में विचार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002
- राजेश जोशी: नेपथ्य में हँसी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2004
- kavitasamay.org
- hindisamay.com
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