वर्णव्यवस्थाया: शैक्षिकनिहितार्थ:

Authors

  • डॉ. दिनेशकुमारयादव: सहायकाचार्य:, श्रीलालबहादुरशास्त्रीराष्ट्रीय, संस्कृतविश्वविद्यालय:, नवदेहली, भारत।

Abstract

भारतवर्षे वर्णव्यवस्थाया: प्रारम्भ: वैदिककालादेव मन्यते।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमारीद्बाहू राजन्यः कृतः।
उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रोऽजायत।।1
अत्र समाजस्य कल्पना पुरुषसरूपेण कृता वर्तते। अर्थात् मानवशरीरस्य अङ्गानामिव। यथा शरीरस्य अङ्गानि कार्यं कुर्वन्ति तथैव एतानि वर्णानि समाजे स्वकर्तव्यम् निर्वहन्ति। तेन सम्पूर्णसमाजस्य कार्यव्यवहारः सम्यक् प्रचलति। वर्णशब्दस्य निष्पत्ति: ‘वृज वरणे’ धातुना अभवत् । यस्यार्थोऽस्ति – वरणं चयनं वा। प्रारम्भिककाले वर्णव्यवस्थायाः आधारः कर्म एवासीत्, यस्य प्रमाणं मनुस्मृतौ विद्यते

Keywords:

References

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  2. मनुस्मृति 2/28
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  4. महाभारतम् 72/6/8
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Published

2021-04-25

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Research Articles

How to Cite

[1]
डॉ. दिनेशकुमारयादव:, " वर्णव्यवस्थाया: शैक्षिकनिहितार्थ: " Shodhshauryam International Scientific Refereed Research Journal (SHISRRJ), ISSN : 2581-6306, Volume 4, Issue 2, pp.214-218, March-April-2021.